Wednesday, February 19, 2014

बाल पॉकेट बुक्स-रहस्य खुल गया (राजन-इक़बाल एस.सी बेदी)




Click Here to Download the Bal Pocket Book

बाल पॉकेट बुक्स-रहस्य खुल गया (राजन-इक़बाल एस.सी बेदी)
इस सीरीज कि मैंने कई बाल पॉकेट बुक्स अपलोड की है और उन्हें लोगो ने खूब पसंद किया है और मुझे इसके साथ भी यही उम्मीद है। राजन-इक़बाल के जन्मदाता एस. सी. बेदी जी दुबारा से बाल पॉकेट बुक्स लिख रहे है और उम्मीद है की जल्दी ही हमें दुबारा से नयी बाल पॉकेट बुक्स पढ़ने को मिलेंगी। मेरा बहुत ही व्यस्त कार्यकर्म ने इसके अपलोडिंग में रोक लगा दी है और यही कॉमिक्स कि अपलोडिंग के साथ भी हो रहा है पर उम्मीद करता हूँ कि चाहे कम ही सही पर इन दोनों कि अपलोडिंग मै करता ही रहूँ।
 आज भी मेरा मन कुछ आशान्त है, पता नहीं लोग कब अपने सच्चे शुभचिंतको को पहचानेगे और उनकी बातो में नहीं आयेंगे जो उनसे सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए ही जुड़े है। जीवन कभी-कभी कितना कठिन हो जाता है इसका अंदाजा मुझे आज कल खूब कायदे से हो रहा है। हम सब ने कभी न कभी जादूगर का खेल जरुर देखा होगा। हम सभी ये बात अच्छे से जानते है कि वो हमें बेवकूफ बनता है फिर भी हम हमेशा उसके बहकावे में आ जाते है जानते है क्यों ? क्योंकि वो अगर बाएं हाथ से हमें धोखा देना चाहता है तो हमारा ध्यान दायें हाथ कि तरफ लगा देता और बाएं हाथ से आराम से धोखा दे देता है और ख़ुशी से बेवकूफ बन कर खुश हो जाते है। हमारी जिंदगी में भी ऐसा ही होता है मान लिया लिया जाये कि मै स्कूल में अपनी क्लास में अच्छे से नहीं पढ़ा पता तो मै अपनी नौकरी बचाने के लिए क्या कर सकता हूँ तो उसका जो सबसे आसान तरीका है की मै स्कूल का ध्यान या हो किसी दूसरे टीचर पर लगा दूँ या फिर किसी बच्चे पर जिससे स्कूल मैनजमेंट का ध्यान मेरे पर से हट जाये और जिंदगी आराम से चलती रहे। मुझे तो लगता है की आधे से ज्यादा लोगो कि जिंदगी ऐसे ही चलती है और जिनको काम करना आता होगा उनके पास इन सब का समय ही नहीं होगा। इसमें गलती बनाने वालों कि नहीं बनने वालों की है।
 अब बात कुछ समय के बारे में कर लेनी चाहिए, मुझसे लोगो को इस बात से ज्यादा शिकायत रहती है कि मै स्कूल के बच्चो पर औरों कि तरह सख्त नहीं हूँ बल्कि जरुरत से ज्यादा नरम हूँ और मैं इस बात को मानता भी हूँ। पर अब समय बदल गया है आज के बच्चे समय से पहले बड़े हो गए है जो बात हमें २५ साल में भी पता नहीं चलती थी वो आज १० साल के बच्चो को पता है मतलब यदि मैं १५ से १८ के बच्चो को पढ़ा रहा हूँ तो मुझे उनके साथ कम से कम २५ साल के आदमी कि तरह से लेना चाहिए और उनके साथ वैसा ही व्यौहार करना चाहिए मैं वैसा ही करने कि कोशिश करता हूँ। अब बात सजा देने के तरीके ही है तो उसे हमें बदलने कि जरूरत है जो तरीका आज से १० साल पहले प्रभावी था वो आज उतना प्रभवी नहीं हो सकता। कुछ उसी तरह से जैसे आज से ५० साल पहले बैलगाड़ी सफ़र का अच्छा साधन था पर आज वो तारिक बचकाना ही है। मै अपने ब्लॉग पर जो कुछ भी लिखता हूँ वो मेरा व्यक्तिगत विचार होता है जैसा कि मै समझता हूँ कि होना चाहिए पर ये बिलकुल भी जरुरी नहीं है कि वो सर्वथा सही ही हो उसे सिर्फ मेरे विचार कि तरह ही लेना चाहिए।